नई दिल्ली : दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था इस समय ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, व्यापारिक तनाव, सप्लाई चेन में बदलाव और डॉलर की भूमिका को लेकर चल रही बहस के बीच दुनिया की नजर अब नई दिल्ली पर है। भारत 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS अपने गठन के दो दशक पूरे कर रहा है। भारत के सामने चुनौती केवल सम्मेलन आयोजित करने की नहीं, बल्कि अलग-अलग रणनीतिक हितों वाले देशों के बीच ऐसी सहमति बनाने की है जो आने वाले वर्षों में संगठन की दिशा तय कर सके।
आखिर क्यों महत्वपूर्ण है BRICS?
BRICS की शुरुआत मूल रूप से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के विचार से हुई थी। समय के साथ इसका दायरा अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर वैश्विक शासन, व्यापार, वित्त, तकनीक, ऊर्जा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और कूटनीति तक पहुंच गया। आज BRICS केवल पांच देशों का पुराना समूह नहीं है। इसके विस्तार ने इसे ग्लोबल साउथ की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मंच बना दिया है। इसी वजह से दिल्ली में होने वाली बैठक को सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे बदलती वैश्विक व्यवस्था में उभरते देशों की भूमिका तय करने वाली बैठक के रूप में देखा जा रहा है। भारत की 2026 की अध्यक्षता का आधिकारिक विजन Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के इर्द-गिर्द तैयार किया गया है।
भारत की प्राथमिकता क्या है?
भारत BRICS को किसी एक देश या पश्चिमी दुनिया के खिलाफ राजनीतिक गठबंधन के रूप में पेश करने के बजाय आर्थिक और संस्थागत सहयोग के प्रभावी मंच के रूप में मजबूत करना चाहता है।नई दिल्ली की प्राथमिकताओं में व्यापार को आसान बनाना, सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और विविध बनाना, डिजिटल अर्थव्यवस्था, वित्तीय सहयोग, छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए अवसर, तकनीकी सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं। BRICS Economic Partnership Strategy 2030 को भी सम्मेलन के प्रमुख आर्थिक परिणामों में शामिल किए जाने की संभावना है। प्रस्तावित रणनीति का उद्देश्य व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन और वित्तीय सहयोग को अगले दशक के लिए अधिक व्यवस्थित दिशा देना है।
डॉलर की जगह क्या BRICS कोई नई व्यवस्था बनाएगा?
BRICS सम्मेलन से पहले सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे की हो रही है, वह अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था और डॉलर की भूमिका है।BRICS देशों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने पर लगातार चर्चा हुई है। हालांकि इसे सीधे तौर पर ‘डॉलर खत्म करने’ की परियोजना के रूप में देखना सही नहीं होगा। रूस ने सम्मेलन से ठीक पहले स्पष्ट किया है कि वह ‘डी-डॉलराइजेशन’ को अपने एजेंडे के रूप में आगे नहीं बढ़ा रहा और स्वीकार्य भुगतान माध्यमों के लिए खुला है। इसका संकेत यह है कि BRICS में चर्चा किसी एक नई साझा मुद्रा बनाने से ज्यादा भुगतान प्रणालियों को अधिक लचीला बनाने और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने पर केंद्रित हो सकती है। भारत भी BRICS के भीतर किसी जल्दबाजी वाली साझा मुद्रा के बजाय व्यावहारिक आर्थिक सहयोग और भुगतान प्रणालियों की इंटरऑपरेबिलिटी पर अधिक जोर देता रहा है।
चीन के साथ भारत की बातचीत पर भी दुनिया की नजर
दिल्ली BRICS सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत-चीन संबंध भी होंगे। भारत और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद के कारण तनाव रहा है। हालांकि हाल के समय में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं। BRICS के मंच पर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी आर्थिक और रणनीतिक बातचीत का अवसर भी पैदा करती है। भारत चीनी निवेश से जुड़ी बाधाओं, महत्वपूर्ण तकनीक के आयात, औद्योगिक कच्चे माल और कुछ आवश्यक तकनीकी उपकरणों की आपूर्ति जैसे मुद्दे उठा सकता है। खास तौर पर दुर्लभ खनिजों और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े विषय भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। यानी दिल्ली में BRICS की बहुपक्षीय कूटनीति के साथ-साथ भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों की दिशा पर भी नजर रहेगी।
आर्थिक भगोड़ों पर भारत का बड़ा प्रस्ताव
भारत BRICS देशों के बीच आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी पहल कर रहा है।भारत सम्मेलन में ऐसा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रख सकता है, जिसके जरिए सदस्य देशों के बीच वित्तीय और जांच संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान तेजी से हो और आर्थिक अपराध के आरोपियों की पहचान, ट्रैकिंग और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। यह मुद्दा भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीमा पार आर्थिक अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी अब केवल किसी एक देश की कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गए हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था और नई तकनीक भी एजेंडे में BRICS का भविष्य केवल पारंपरिक व्यापार और बैंकिंग तक सीमित नहीं रहने वाला। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, फिनटेक और सीमा-पार डिजिटल भुगतान आने वाले वर्षों में संगठन के महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं। भारत अपने UPI जैसे डिजिटल भुगतान अनुभव को BRICS देशों के साथ साझा करने और सीमा-पार भुगतान को अधिक तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाने की दिशा में सहयोग बढ़ाना चाहता है। हालांकि डिजिटल वित्तीय संपर्क के साथ डेटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे सवाल भी जुड़े हुए हैं। हाल में भारत ने चीन से जुड़ी Alipay+ भुगतान कनेक्टिविटी के प्रस्ताव को सुरक्षा और डेटा संबंधी चिंताओं के कारण आगे नहीं बढ़ाया। इससे स्पष्ट है कि भारत आर्थिक कनेक्टिविटी बढ़ाने के साथ सुरक्षा को भी बराबर महत्व दे रहा है।
ग्लोबल साउथ की आवाज बनने की कोशिश
BRICS की सबसे बड़ी राजनीतिक संभावनाओं में से एक है—Global South को अधिक मजबूत आवाज देना। विकासशील देशों का तर्क है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक संस्थाओं की संरचना आज की आर्थिक और जनसंख्या वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और वैश्विक आर्थिक निर्णय लेने वाली व्यवस्थाओं में सुधार की मांग BRICS देशों के एजेंडे में लगातार रही है। भारत भी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था की वकालत करता रहा है। दिल्ली सम्मेलन इस मुद्दे को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
BRICS के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
BRICS की ताकत उसकी विविधता है, लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। सदस्य देशों के राजनीतिक हित हमेशा एक जैसे नहीं होते। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव है। पश्चिम एशिया के मुद्दों पर भी सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे माहौल में हर मुद्दे पर एक जैसी राय बनाना आसान नहीं होगा। इसलिए दिल्ली सम्मेलन की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि कितने समझौते हुए, बल्कि यह भी होगा कि भारत कितने अलग-अलग हितों वाले देशों को साझा एजेंडे पर साथ ला पाता है।
दुनिया के लिए दिल्ली सम्मेलन का संदेश क्या होगा?
18वां BRICS सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया एकध्रुवीय व्यवस्था से अधिक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि BRICS को टकराव के मंच के बजाय सहयोग के मंच के रूप में मजबूत किया जाए। यदि सदस्य देश व्यापार, निवेश, डिजिटल तकनीक, वित्तीय भुगतान, ऊर्जा, स्वास्थ्य और सप्लाई चेन जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों में ठोस प्रगति कर पाते हैं, तो BRICS की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ सकती है। लेकिन अगर भू-राजनीतिक मतभेद आर्थिक एजेंडे पर हावी हो जाते हैं, तो संगठन के सामने अपनी बढ़ती ताकत को वास्तविक परिणामों में बदलने की चुनौती बनी रहेगी।
दिल्ली से आगे की कहानी
12-13 सितंबर को होने वाला BRICS सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर केवल दो दिनों की बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए यह अपनी कूटनीतिक क्षमता दिखाने का अवसर है। चीन और रूस जैसे प्रमुख देशों के साथ संबंधों को संभालते हुए पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की बड़ी परीक्षा होगी।दूसरी ओर, BRICS के लिए यह तय करने का समय है कि वह केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह बना रहेगा या वास्तव में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली एक प्रभावी संस्था के रूप में विकसित होगा।
